पटना के रंगमंचीय परिदृश्य में शिवेन्द्र सिन्हा राष्ट्रीय रंग महोत्सव 2026 एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट पहल के रूप में सामने आया। बिहार ग्रामीण बैंक तथा कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार के सौजन्य से, कल-संस्कृति के संवर्धन एवं विकास के लिए सतत प्रयत्नशील हाउस ऑफ वेराइटी और दस्तक, पटना के संयुक्त प्रयास से आयोजित इस महोत्सव ने अगस्त से अक्टूबर तक कुल तीन महीनों में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित रंग-समूहों और रंग-भाषाओं को पटना के दर्शकों से जोड़ा।
महोत्सव की खासियत केवल इसकी विविध प्रस्तुतियाँ नहीं, बल्कि इसका वीकेंड-आधारित और टिकटेड आयोजन भी रहा। प्रस्तुतियों के लिए टिकट लेकर आने वाले दर्शकों की उत्साहजनक उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पटना में गुणवत्तापूर्ण रंगमंच के लिए दर्शक मौजूद हैं। कई प्रस्तुतियों में बड़ी संख्या में दर्शकों की मौजूदगी इस धारणा को भी चुनौती देती है कि हिंदी प्रदेशों में लोग टिकट लेकर नाटक देखने नहीं आते।
इस लिहाज से यह महोत्सव केवल नाटकों की श्रृंखला नहीं, बल्कि पटना में एक सक्रिय और दर्शक-केंद्रित रंगमंचीय संस्कृति विकसित करने की कोशिश के रूप में महत्वपूर्ण है।
स्मृति से सक्रिय रंगमंच तक
महोत्सव का नाम वरिष्ठ रंगकर्मी शिवेन्द्र सिन्हा की स्मृति से जुड़ा है। 23 जनवरी 1933 को जन्मे शिवेन्द्र सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में प्रथम श्रेणी में एमए किया। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से ड्रामेटिक आर्ट में डिप्लोमा प्राप्त किया तथा राडा और ब्रिटिश ड्रामा लीग से प्रशिक्षण लिया। 7 अप्रैल 2003 को उनका निधन हुआ।
शिवेन्द्र सिन्हा उन विरले भारतीय संस्कृतिकर्मी में थे, जिन्होंने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का काम किया। पेशेवर रंगमंच का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने ब्रिटेन में रंगमंच और टेलीविजन के क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम किया और अपने अभिनय तथा रंगमंचीय अनुभव को व्यापक पहचान दिलाई। भारत लौटने के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशन के माध्यम से सामाजिक और मानवीय सरोकारों को अभिव्यक्ति दी। उनकी रचनात्मक यात्रा रंगमंच, टेलीविजन और सिनेमा—तीनों माध्यमों में फैली रही। विशेष रूप से “किस्सा कुर्सी का” से उनका जुड़ाव भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस प्रकार शिवेन्द्र सिन्हा का कार्य केवल अभिनय, लेखन और निर्देशन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारतीय रंग और सिनेमा की आधुनिक संवेदना को व्यापक परिप्रेक्ष्य देने में भी योगदान किया।
रंगमंच के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और रचनात्मक योगदान को स्मरण करते हुए आयोजित यह महोत्सव उनकी विरासत को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे सक्रिय रंगमंचीय गतिविधि से जोड़ता है। कुल 13 प्रस्तुतियों में पटना के साथ मुंबई और गुवाहाटी की रंग संस्थाओं ने भाग लिया।
विविध रंगभाषाओं का मंच
महोत्सव की शुरुआत दस्तक, पटना की “तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम” से हुई। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों, शैलेन्द्र की फिल्म तीसरी कसम, गुलाब बाई के गीतों और कबीर के भजनों से प्रेरित इस प्रस्तुति की परिकल्पना, लेखन और निर्देशन पुंज प्रकाश ने किया। ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति और प्रेम को केंद्र में रखती यह प्रस्तुति साहित्य, सिनेमा, लोक संगीत और रंगमंच के बीच संवाद स्थापित करती है।
गुवाहाटी के सीगल थिएटर की “दिन के अँधेरे”, फेडेरिको गार्सिया लोर्का के विश्व प्रसिद्ध नाटक द हाउस ऑफ़ बर्नार्डा अल्बा पर आधारित थी। भागीरथी बाई के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने स्त्री-अस्तित्व, सामाजिक नियंत्रण और पारिवारिक दमन के सवालों को सामने रखा। फेडेरिको गार्सिया लोर्का का विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘द हाउस ऑफ़ बर्नार्डा अल्बा’ पितृसत्तात्मक समाज, स्त्री-दमन, सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संघर्ष को केंद्र में रखता है। पति की मृत्यु के बाद बर्नार्डा अल्बा अपनी पाँच बेटियों पर कठोर अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं का पहरा लगा देती है, जिसके भीतर उनकी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ घुटती रहती हैं। नाटक दमन, सत्ता, इच्छा, ईर्ष्या और स्वतंत्रता की मानवीय आकांक्षा के टकराव की एक तीखी त्रासदी है।
मुंबई की चक्रव्यूह परफॉर्मिंग आर्ट्स की “कम से कम कॉफी तो अच्छी है” ने रंगमंच में मुंबई के मायानगरी में सिनेमा के क्षेत्र में संघर्षरत युवाओं के सपनों और असुरक्षाओं को स्वर दिया। वहीं उजागर ड्रामेटिक सोसाइटी की “मिथ्यासुर” ने मिथक, आस्था, सत्ता और सत्य के प्रश्नों को अपनी विशिष्ट रंगभाषा में रखा। “मिथ्यासुर” मिथक और समकालीन यथार्थ के बीच संवाद स्थापित करने वाला नाटक है। इसकी विषय-वस्तु झूठ, छल, सत्ता और मनुष्य की बदलती नैतिक चेतना के इर्द-गिर्द बुनी गई है। नाटक मिथ्या के विस्तार और उसके सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के माध्यम से सत्य की प्रासंगिकता पर सवाल उठाता है।
कलेक्टिव मैडनेस, मुंबई की मनीष वर्मा लिखित-निर्देशित “जम्प” भी उल्लेखनीय रही। दिलनाज़ ईरानी और संजय सोनू अभिनीत इस प्रस्तुति ने दो अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों के पात्रों के माध्यम से महानगरीय अकेलेपन, सफलता और मानवीय जुड़ाव को देखा। “जम्प” एक संवेदनशील और मानवीय नाटक है, जो जीवन के संकट, अकेलेपन और अस्तित्व के सवालों को केंद्र में रखता है। एक ऊँची इमारत की छत पर घटित संवाद के माध्यम से नाटक बताता है कि सफलता के पीछे छिपा अकेलापन कितना गहरा हो सकता है और कभी-कभी एक अनजान व्यक्ति से हुई छोटी-सी बातचीत भी जीवन को देखने का नजरिया बदल सकती है।
वरिष्ठ रंगकर्मियों से लोकनाट्य तक
सितंबर में सलीम आरिफ निर्देशित “हमसफ़र” और “रिडेवलपमेंट” ने महोत्सव को वरिष्ठ रंगकर्मियों की उपस्थिति से समृद्ध किया। प्रसिद्ध कवि गुलज़ार की कविताओं से सुसज्जित, जावेद सिद्दीकी के लेखन और हर्ष छाया तथा लुबना सलीम जैसे कलाकारों की भागीदारी वाली इन प्रस्तुतियों ने क्रमशः रिश्तों-स्मृतियों तथा शहरी विकास और विस्थापन के सवालों को केंद्र में रखा।
मुंबई के मंच की प्रस्तुतियों— प्रसिद्ध रंग गुरु बी एम शाह निर्देशित नाटक “कंजूस” फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य नाटक “द मिसर” से प्रभावित है। इसमें धन के प्रति अत्यधिक मोह और कंजूसी के कारण पैदा होने वाली पारिवारिक एवं सामाजिक विसंगतियों को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। नाटक लालच, धन-मोह और मानवीय संबंधों के बीच के तनाव को उजागर करता है।
मोहन राकेश का “आधे-अधूरे” आधुनिक मध्यवर्गीय परिवार के भीतर मौजूद तनाव, असंतोष, अकेलेपन और रिश्तों में बढ़ती दूरी को केंद्र में रखता है। नाटक सावित्री और उसके परिवार के माध्यम से मनुष्य की अधूरी आकांक्षाओं, असफल दांपत्य जीवन और भावनात्मक असुरक्षा को सामने लाता है। यह उस मध्यवर्गीय जीवन की विडंबना को उजागर करता है, जहाँ व्यक्ति पूर्णता की तलाश में लगातार अधूरा ही रह जाता है।
देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार और हंस प्रतीक के संपादक संजय सहाय निर्देशित, जे बी प्रिसले के विख्यात नाटक नाटक ‘एन इंस्पेक्टर कॉल्स’ पर आधारित “तफ्तीश” ने महोत्सव में एक अलग ही आस्वाद पैदा किया। जे. बी. प्रिसले का विख्यात नाटक ‘एन इंस्पेक्टर कॉल्स’ सामाजिक असमानता, वर्गभेद और मानवीय जिम्मेदारी के प्रश्नों को केंद्र में रखता है। एक रहस्यमय इंस्पेक्टर के आगमन के माध्यम से नाटक एक संपन्न परिवार के स्वार्थ, संवेदनहीनता और सामाजिक शोषण की परतें खोलता है। यह दर्शाता है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और दूसरों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए जिम्मेदार है।
हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना पर आधारित विजय कुमार की चर्चित एकल प्रस्तुति “हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं” ने सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य को रंगमंचीय अभिव्यक्ति दी। विजय कुमार की चर्चित एकल प्रस्तुति “हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं” बिहार की राजनीतिक और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा, व्यंग्यात्मक और मनोरंजक रंगमंचीय हस्तक्षेप है। एकल अभिनय के माध्यम से यह प्रस्तुति चुनावी राजनीति, सत्ता, जातीय समीकरण और आम आदमी की आकांक्षाओं को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। लगभग चार दशकों में 1,050 से अधिक मंचन इस प्रस्तुति की लोकप्रियता, निरंतर प्रासंगिकता और रंगमंचीय प्रभाव का अद्भुत प्रमाण है। हास्य और व्यंग्य के माध्यम से समकालीन बिहार की जमीनी हकीकत को प्रस्तुत करना इसकी विशिष्ट पहचान है।
मंच मुंबई की ये सभी प्रस्तुतियाँ न्यूनतम संसाधनों के माध्यम से अधिकतम रंगमंचीय प्रभाव उत्पन्न करने की सृजनात्मक क्षमता का सशक्त उदाहरण थीं। सीमित साधनों के बावजूद अपनी अभिनव रंगभाषा, प्रभावशाली अभिनय और प्रस्तुति-कौशल के माध्यम से इन प्रस्तुतियों ने सिद्ध किया कि रंगमंच की असली शक्ति संसाधनों की प्रचुरता में नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता, प्रतिबद्धता और रचनात्मक ऊर्जा के सार्थक इस्तेमाल में निहित है।
महोत्सव में पटना की नाद संस्था की प्रस्तुति के रूप में भिखारी ठाकुर का कालजयी नाटक “गबरघिचोर” भी शामिल रहा। भोजपुरी लोकजीवन, प्रेम, विवाह और पितृत्व से जुड़े सवालों को लोकभाषा, गीत-संगीत और हास्य के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली यह कृति स्त्री की स्वतंत्रता, सामाजिक नैतिकता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्विरोधों को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। सहज लोकनाट्य शैली और गहरी सामाजिक दृष्टि के कारण “गबरघिचोर” आज भी बिहार की समृद्ध लोक रंग-परंपरा और उसकी समकालीन प्रासंगिकता का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है।
महोत्सव का समापन दस्तक, पटना की “अंधा युग” प्रस्तुति से हुआ। धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध काव्य-नाटक की नई परिकल्पना और निर्देशन पुंज प्रकाश ने किया। युद्धोत्तर महाभारत के माध्यम से हिंसा, सत्ता, नैतिक संकट और मनुष्य के भीतर के अंधकार को सामने लाती इस प्रस्तुति की विशेषता आज के अभिनेताओं द्वारा शुद्ध हिंदी और संस्कृत के स्पष्ट उच्चारण, संवादों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति तथा परिवेश और भावभूमि के अनुरूप वस्त्र और संगीत की परिकल्पना रही। दस्तक और पुंज प्रकाश की नई रंगभाषा, प्रयोगधर्मी मंचीय शिल्प और पारंपरिक कथ्य की आधुनिक व्याख्या की रंग-दृष्टि “अंधा युग” में भी प्रभावी रूप से दिखाई दी।
टिकटेड थिएटर और दर्शक संस्कृति
विविधतापूर्ण नाट्य प्रस्तुतियों और पेशेवर दृष्टिकोण से समृद्ध इस महोत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष टिकटेड थिएटर रहा। प्रस्तुतियों में दर्शकों की लगातार और उत्साहपूर्ण उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि यदि नाटक में गुणवत्ता, विश्वसनीयता और दर्शकों से जुड़ने की क्षमता हो, तो दर्शक उसके लिए टिकट खरीदकर रंगमंच का समर्थन करने को भी तैयार हैं।
यह बात पटना जैसे शहर में खास महत्व रखती है, जहाँ रंगमंच के सामने लंबे समय से दर्शक संख्या और आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न मौजूद रहा है। महोत्सव ने कम-से-कम इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत दिया है कि दर्शक और रंगमंच के बीच आर्थिक संबंध भी विकसित किया जा सकता है।
स्थानीय रंगमंच से राष्ट्रीय संवाद तक
महोत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी विविधता और विस्तार में दिखाई देती है। अलग-अलग पीढ़ियों के रंगकर्मी, विभिन्न शहरों की रंग संस्थाएँ और अनेक रंग शैलियाँ एक साथ आईं। साहित्यिक रूपांतरण, समकालीन नाटक, लोकनाट्य, एकल प्रस्तुति और क्लासिक कृतियाँ—इन सबने मिलकर रंगमंच की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत की।
भागीरथी बाई, विजय कुमार, हर्ष छाया, सलीम आरिफ, लुबना सलीम, संजय सोनू, दिलनाज़ ईरानी, पुंज प्रकाश, मनीष वर्मा, अजीत सिंह पल्लावत और इप्शिता चक्रवर्ती जैसे रंगकर्मियों की भागीदारी ने आयोजन को व्यापक रंगपरिदृश्य से जोड़ा। वहीं संजय सहाय, सुमन सिन्हा, श्रीकांत किशोर और हृषीकेश सुलभ जैसे साहित्य-संस्कृति से जुड़े व्यक्तित्वों की उपस्थिति ने इसे अतिरिक्त गरिमा दी।
इस तरह पटना में प्रस्तुतियाँ केवल स्थानीय रंग गतिविधि तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों की रंग परंपराओं के साथ संवाद का माध्यम बनीं।
एक संभावना की शुरुआत
किसी रंग महोत्सव का मूल्यांकन केवल प्रस्तुतियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वह शहर की रंग संस्कृति में क्या जोड़ता है। इस कसौटी पर शिवेन्द्र सिन्हा राष्ट्रीय रंग महोत्सव 2026 एक महत्वपूर्ण शुरुआत दिखाई देता है।
तीन महीनों तक चलने वाला आयोजन, 13 प्रस्तुतियाँ, विभिन्न शहरों के रंग-समूह, विविध रंग-भाषाएँ और टिकट लेकर आने वाले दर्शक—इन सबने मिलकर पटना में एक अधिक नियमित और दर्शक-केंद्रित रंग संस्कृति की संभावना को सामने रखा है।
शिवेन्द्र सिन्हा की स्मृति को सक्रिय रंगमंच से जोड़ना इस आयोजन को अतिरिक्त अर्थ देता है। हाउस ऑफ वेराइटी और दस्तक का यह संयुक्त प्रयास इस मायने में उल्लेखनीय है कि उसने रंगमंच को केवल आयोजन नहीं, बल्कि समाज से निरंतर सांस्कृतिक संवाद के रूप में देखने की कोशिश की है।
